“अपराधी बाबा”… आखिर ये शब्द किस आधार पर लिखा गया? और क्या किसी धार्मिक संत को लेकर इतनी गंभीर टिप्पणी करने से पहले कानूनी रिकॉर्ड की पड़ताल की गई थी?

हरिद्वार से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है…
एक खबर की सिर्फ एक लाइन अब कोर्ट तक पहुंच गई है।

मामला है धार्मिक संत और महामंडलेश्वर श्री करौली शंकर महादेव को एक खबर में “अपराधी बाबा” लिखे जाने का।

आरोप है कि यह खबर पत्रकार/पोर्टल संचालक संजय कश्यप के पोर्टल पर प्रकाशित हुई थी। इसके बाद अधिवक्ता अरुण भदौरिया ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और BNSS की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने की मांग की।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
“अपराधी” शब्द का कानूनी आधार क्या था?
क्या संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई दोषसिद्धि थी?
क्या FIR, चार्जशीट और कोर्ट रिकॉर्ड की पड़ताल की गई थी?
और अगर की गई थी… तो उस पड़ताल का आधार क्या था?
शिकायतकर्ता ने अदालत में आरोप लगाया है कि खबर प्रकाशित करने से पहले इन पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं की गई और “अपराधी बाबा” जैसे शब्द का इस्तेमाल उनकी धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है।
यानी सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है…
सवाल पत्रकारिता में इस्तेमाल किए गए उस शब्द के पीछे के सबूत और कानूनी आधार का भी है।
शिकायतकर्ता ने पहले 15 सितंबर को ज्वालापुर पुलिस और फिर 18 सितंबर को SSP हरिद्वार से शिकायत करने का दावा किया। कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए मामला अदालत पहुंचा।
अब अदालत ने ज्वालापुर पुलिस से रिपोर्ट तलब की है और 26 सितंबर को आगे की कार्रवाई के लिए रिपोर्ट मांगी गई है।
लेकिन यहां एक बेहद अहम बात—
अभी अदालत ने न तो FIR का अंतिम आदेश दिया है और न ही शिकायत में लगाए गए आरोपों को सही ठहराया है। फिलहाल मामला शिकायत, पुलिस रिपोर्ट और आगामी न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर है। संजय कश्यप का पक्ष सामने आने पर उसे भी शामिल किया जाना जरूरी होगा।
तो अब असली सवाल यही है—
“अपराधी बाबा” शब्द खबर की भाषा थी, किसी दस्तावेज का निष्कर्ष था… या उसके पीछे कोई और आधार था?
**26 सितंबर को पुलिस की रिपोर्ट इस पूरे विवाद में अगला बड़ा मोड़ साबित हो सकती है।**
